विश्व भूख दिवस 2020: कोरोना संकट के बीच भूख से दो दो हाथ

भूख से मतलब सिर्फ पेट का भरना नहीं है, भूख एक सतत चलने वाला सिलसिला है। जो हमारे जीवन के कई रास्तों का निर्धारण भी करता है।

आदित्य मिश्रा 

विश्व भूख दिवस, 2011 में इसकी शुरुआत हुई थी और वर्ष 2020 में दसवीं बार यह मनाया जा रहा है। भूख आदमी की सबसे महत्वपूर्ण जरूरतों में से एक है। इसे अन्य सभी गतिविधियों का केंद्र बिंदु भी कह सकते हैं क्योंकि कहावत भी है ‘आदमी पेट के लिए ही सब कुछ करता है’।

भूख से मतलब सिर्फ पेट का भरना नहीं है, भूख एक सतत चलने वाला सिलसिला है। जो हमारे जीवन के कई रास्तों का निर्धारण भी करता है। ‘विश्व भूख दिवस’ मनाने के पीछे सबसे बड़ा मकसद खानपान की अहमियत को समझना है। खाने का सही चयन, उचित पोषण आहार, साफ-सफाई और पर्याप्त मात्रा जैसे मुद्दों पर जागरूकता फैलाना इस पूरे अभियान का मकसद है। खाने को खाना ही नहीं पहचानना भी हमारे लिए काफी महत्वपूर्ण होता है।

इन दिनों एक तरफ हम सभी कोरोना वायरस महामारी से जूझ रहे हैं। इसका सीधा सा असर कई बड़ी गतिविधियों पर पढ़ रहा है। जिसके दूरगामी परिणाम अच्छे नहीं दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में आने वाले दिनों के लिए एक बेहतर रणनीति और उसके सफल होने की पूरी तैयारी करनी पड़ेगी।

लॉक डाउन के समय जब सभी अपने घर में हैं, ऐसे वक्त में अच्छी सेहत के लिए खाने का उचित चयन काफी आवश्यक हो जाता है। प्रधानमंत्री ने भी अपने संबोधन में लोगों को लोकल में उपलब्ध वस्तुओं का इस्तेमाल करने की सलाह दी थी। इसीलिए यह आवश्यक है कि इस दौर में अपने आसपास उपलब्ध वस्तुओं का सर्वश्रेष्ठ इस्तेमाल किया जाए।

खाने के साथ-साथ अच्छी सेहत के लिए व्यायाम भी जरूरी है। बाहर ना निकलने की शपथ का पालन करते हुए भी घर पर शारीरिक शक्ति को बनाए रखा जा सकता है।

कोरोना वायरस का असर अर्थव्यवस्था से लेकर स्वास्थ्य, खानपान और पोषण आहार, सामाजिक और व्यावहारिक जीवन पर पड़ रहा है। भारत जैसी घनी आबादी वाले देश में ऐसी स्थिति की कल्पना करना एक दुखद सपने जैसा है। हम विकासशील देश हैं, यहां एक बड़ी जनसंख्या अभी भी ग्रामीण क्षेत्रों से जुड़ी हुई है।

जहां सुख सुविधाएं भी धीमी गति से पहुंचती हहैं,लेकिन फिर भी कृषि और छोटे-बड़े उद्योग रीड की हड्डी की तरह काम करते हैं। लॉकडाउन होने के बाद सब कुछ अपनी जगह और रुक गया, इससे सबसे ज्यादा प्रभावित समाज के गरीब और मजदूर वर्ग हुए। कामकाज रुकने के कारण खाने-पीने और आजीविका चलाने की जद्दोजहद शुरू हो गई। इसी का परिणाम रहा कि शहरों से भारी संख्या में मजदूर गांव की तरफ पलायन करने लगे।

पलायन रहन-सहन ही नहीं पूरे तंत्र पर अपना असर डालता है। भारत जैसे विशाल देश में सामानों की आवाजाही और उनकी उपलब्धता में मजदूरों की बड़ी भागीदारी रहती है। मौजूदा परिस्थिति में सबसे बड़ी समस्या काम करने वाले लोगों की कमी होने वाली है।

शहर से गांव की तरफ आए मजदूर वर्ग में एक तरह का डर भी बैठ गया है, जो उन्हें दोबारा शहर जाने से रुकने का कारण हो सकता है। ऐसे में सरकार और प्रशासन के प्लान में मजदूरों के अंदर दोबारा विश्वास मजबूत करना भी प्राथमिकता होगी।

हालांकि राज्य सरकारें प्रदेश में आए हुए मजदूरों को रोजगार उपलब्ध करवाने का इंतजाम कर रही हैं। इसके साथ ही राहत पैकेज में खाने के लिए राशन और अन्य जरूरी सामान यथासंभव उपलब्ध करवाए जा रहे हैं। 20 लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज का सही तरीके से इस्तेमाल इस परेशानी में बड़ा मददगार हो सकता है।

अभी के हालात को देखते हुए सबसे बड़ी प्राथमिकता आम जनता और गरीबों के बीच खानपान को पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध करवाना है। जरूरी पोषण और पर्याप्त मात्रा में राशन काफी आवश्यक है क्योंकि शरीर की इम्युनिटी को बढ़ाने में इनका अहम योगदान पता है।

वैसे भी देश में कई ऐसे राज्य हैं, जो पहले से ही कुपोषण जैसी समस्या से ग्रसित हैं। कुपोषित और अति कुपोषित बच्चों की संख्या को देखते हुए पोषण और रोजगार को प्राथमिकता देनी पड़ेगी। सामुदायिक प्रबंधन की नीति के माध्यम से कुपोषण की लड़ाई को जीतने की कोशिश जारी है इसी को और मजबूत करने की आवश्यकता है।

दूसरी तरफ कोरोना काल के आने से इसमें और बढ़ोतरी हो सकती है। अर्थतंत्र के पूरी तरह से बिगड़ने के कारण हालात सामान्य रखना आसान नहीं है। इसीलिए सरकारी तंत्र और प्रशासनिक तबके के सभी लोगों को मुस्तैदी के साथ काम करने की आवश्यकता है।

किसान वर्ग इस पूरी लड़ाई में सबसे अहम किरदार निभा रहे हैं। खेत में फसल उगने के बाद उसका सही तरीके से बाजार तक पहुंचना और अलग-अलग हिस्सों में भेजना रणनीति का अहम हिस्सा है। कई किसान ऐसे भी हैं, जिनकी फसल लॉक डाउन के चलते बाजार तक नहीं पहुंच पा रही है।

यही बाद में राशन की कमी का कारण बन सकता है। इसीलिए सबसे पहले शहर से गांव में आए मजदूरों का कृषि क्षेत्र में इस्तेमाल किया जाना चाहिए। इससे उन्हें रोजगार भी मिल जाएगा और किसानों को बड़ी मदद मिलेगी। खाने की अन्य वस्तुएं जैसे फल सब्जी जो कम समय में खराब हो जाते हैं। उनको सही वक्त में बाजार तक पहुंचाना भी आवश्यक हो जाता है। इससे हटकर फूल जैसे अन्य वस्तुओं की पैदावार करने वाली किसान बी अपने उत्पादन का सही मूल्य चाह रहे हैं।

इस बड़ी समस्या के बीच हमें सबसे पहले अलग अलग सामान और उनके सप्लाई चैन को नहीं टूटने देना है। इसके साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में अलग अलग लोगों को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। जिनमें प्रधान, सरपंच जैसे लोग महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। राशन के साथ पोषण आहार की उपलब्धता में आंगनबाड़ी कार्यकत्री का योगदान काफी अहम हो सकता है। जमीनी स्तर पर उनकी पहुंच आम गरीब लोगों तक होती है, जिन की जरूरतों को वह ज्यादा बेहतर तरीके से समझती हैं। इसीलिए भूख की इस जंग में इस हथियार का इस्तेमाल हमें जीत की ओर ले जा सकता है।

(लेखक Development Communication मामलों के विशेषज्ञ हैं.)

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