मेटाबोलिक सिन्ड्रोम के शिकार पुरुषों को कोविड-19 के संक्रमण के समय में क्यों सावधान रहने की जरुरत है?

मेडिकल तथ्यों के मद्देनजर खासकर 30 साल से ज्यादा उम्र वाले पुरुषों को ज्यादा वसा वाले भोजन से परहेज करना चाहिये और लॉकडाउन के दौरान अपने घर में ही कसरत करते हुए खुद को चुस्त-दुरुस्त रखना चाहिये

चिकित्सा विशेषज्ञों ने मेटाबोलिक सिन्ड्रोम के शिकार पुरुषों को चेताया है कि उन्हें कोविड-19 से विशेष तौर पर सावधान रहते हुए स्वस्थ जीवनशैली और उचित खान-पान अपनाने की जरूरत है.

संक्रमण के बाद इस श्रेणी के मरीजों में महामारी की जटिलताएं अपेक्षाकृत ज्यादा सामने आ रही हैं।

मेटाबोलिक सिन्ड्रोम के शिकार मरीजों में उच्च रक्तचाप, रक्त में शर्करा का ऊंचा स्तर, कमर पर जमा अतिरिक्त चर्बी और कोलेस्ट्रॉल का असामान्य स्तर जैसे लक्षण होते हैं। देश में कोरोना वायरस से सबसे ज्यादा प्रभावित जिलों में शामिल इंदौर का श्री अरबिंदो इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (सैम्स) इस महामारी के इलाज से जुड़े सबसे व्यस्त अस्पतालों में शुमार है। अस्पताल के छाती रोग विभाग के प्रमुख डॉ. रवि डोसी अब तक इस महामारी के करीब 1,100 मरीज देख चुके हैं।

डोसी ने रविवार को बताया कि, “कोविड-19 के इन 1,100 मरीजों में शामिल करीब 150 पुरुष ऐसे थे जो मेटाबोलिक सिन्ड्रोम के दायरे में आते हैं। इस सिंड्रोम से जूझ रहे मरीजों के इलाज में अधिक समय लग रहा है क्योंकि संक्रमण के बाद उनमें महामारी की जटिलताएं अपेक्षाकृत ज्यादा सामने आ रही हैं।” उन्होंने बताया, “यह देखा गया है कि कई पुरुष लॉकडाउन के दौरान अपने घर में रहने के दौरान कसरत और उचित खान-पान का ध्यान नहीं रख रहे हैं जिससे वे मेटाबोलिक सिन्ड्रोम की चपेट में आ सकते हैं। अगर ये लोग कोविड-19 से संक्रमित होते हैं, तो सिंड्रोम के दुष्प्रभावों के कारण महामारी के खिलाफ उनकी प्रतिरोधक क्षमता कम हो सकती है।”

डोसी ने सुझाया कि इन मेडिकल तथ्यों के मद्देनजर खासकर 30 साल से ज्यादा उम्र वाले पुरुषों को ज्यादा वसा वाले भोजन से परहेज करना चाहिये और लॉकडाउन के दौरान अपने घर में ही कसरत करते हुए खुद को चुस्त-दुरुस्त रखना चाहिये।

‘मेटाबॉलिक सिंड्रोम’ है क्या?

इस विकार में आपके लीवर और पेट के अंदर की चर्बी में बेतहाशा वृद्धि हो जाती है। यह बात ऊपर से पता भी नहीं चलती. जरूरी नहीं कि आप मोटे लगें पर अंदर खतरनाक वाली चर्बी बढ़ जाती है। यह खून में घुलकर अंतत: दिल और दिमाग की नलियों में जमा होकर उन्हें अवरुद्ध करती रहती है। शरीर में इंसुलिन बनती अवश्य है परंतु शरीर पर उसका जरूरी असर ही नहीं होता। इसी को डॉक्टर लोग ‘इंसुलिन रेजिस्टेंस’ की स्थिति कहते हैं। ऐसे शख्स की ब्लड शुगर बढ़ी रहती है. अंतत: उसे डायबिटीज भी हो सकती है।

इससे खून की नलियों में खुद को तनावमुक्त रखने का गुण भी समाप्त हो जाता है। वे अब ‘रिलैक्स’ नहीं हो पातीं। इससे रक्तचाप बढ़ा रह सकता है। रक्त में खराब किस्म के कोलेस्ट्रॉल बढ़ जाते हैं।

मेटाबोलिक सिंड्रोम मुख्यतः पांच जोखिम कारकों का एक समूह है:

1. उच्च रक्तचाप (130/85 मिमी से अधिक)

2. रक्त शर्करा का उच्च स्तर (इंसुलिन प्रतिरोध)

3. कमर के आसपास अतिरिक्त वसा

4. ट्राइग्लिसराइड का उच्च स्तर

5. एचडीएल (हाई डेंसिटी लिपोप्रोटीन, अच्छा कोलेस्ट्रॉल यानी कि अच्छे कोलेस्ट्रॉल, या एचडीएल की कमी

रिस्क फैक्टर्स

· शरीर के मध्य और ऊपरी हिस्सों के आसपास अतिरिक्त वसा का जमा होना

· इंसुलिन प्रतिरोध मधुमेह जिसमें आपकी कोशिकाएं ख़ून से चीनी को अवशोषित नहीं कर पाती, जिससे ख़ून में शुगर की मात्रा बढ़ जाती है

· आयु

· मेटाबोलिक सिंड्रोम का पारिवारिक इतिहास

· पर्याप्त व्यायाम नहीं करना

· जिन महिलाओं को पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम हुआ हो

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