वर्तमान कोविड-19 संक्रमण की पुष्टि के लिए डॉक्टर कौन सा टेस्ट करा रहे हैं? किस तरह से मालूम पड़ रहा है कि अमुक व्यक्ति सार्स-सीओवी 2 विषाणु से संक्रमित है?

इसकी शुरुआत करते हैं विषाणु की संरचना समझने से। ढेरों विषाणुओं की संरचनाओं में एक साझी बात देखने को मिलती है : प्रोटीन के खोल में बन्द एक डीएनए या आरएनए का टुकड़ा। किन्हीं विषाणुओं में डीएनए की मौजूदगी होती है, किन्हीं अन्य में आरएनए की। सार्स-सीओवी 2 एक आरएनए विषाणु है यानी इसकी संरचना में प्रोटीन-खोल के भीतर आरएनए है, डीएनए नहीं।

विषाणु अपने-आप नहीं पनप सकते, उन्हें पनपने के लिए किसी जानवर या पौधे की कोशिकाओं की ज़रूरत होती है। विषाणु अपने प्रोटीनों की सहायता से जन्तु या पौधे की कोशिका में दाखिल होता है, वहाँ वह कोशिका का दोहन करते हुए अपनी ढेरों प्रतियाँ बनाता है। यह सार्स-सीओवी 2 विषाणु भी मानव-कोशिकाओं में दाखिल होने के बाद इन कोशिकाओं का दोहन करके इनके भीतर अपनी प्रतियाँ बनाता और शरीर में छोड़ता जाता है। फिर ये नये विषाणु दूसरी कोशिकाओं को संक्रमित करते हैं और इस तरह से संक्रमण, नये विषाणुओं का निर्माण और फिर नयी कोशिकाओं का संक्रमण — यह चक्र चलता जाता है।

कोविड-19 संक्रमण के लिए स्टेराइल (यानी अदूषित और एकदम स्वच्छ ) प्लास्टिक-डण्डी के द्वारा नाक या गले के भीतर ( पीछे से ) नमूना एकत्र करते हैं। फेफड़ों में विषाणु वृद्धि करता है, ऐसे में गले या नाक में आ-फँसे बलगम में इनकी मौजूदगी हो सकती है। फिर उचित तापमान में रखकर इस नमूने को जाँच के लिए प्रयोगशाला तक पहुँचाया जाता है। लैब में पहुँचने के बाद सबसे आवश्यक पहला काम नमूने की कोशिकाओं से आरएनए को अलग करना होता है। फिर उसके बाद एक ख़ास एन्ज़ाइम रिवर्स ट्रांसस्क्रिप्टेज़ डालकर इस आरएनए से डीएनए की प्रतियाँ बनायी जाती हैं।

अब इस डीएनए में वह हिस्सा जो सार्स-सीओवी 2 विषाणु का होता है , उसे एम्प्लिफाय यानी अधिक मात्रा में प्रयोगशाला में बनाया जाता है। ( इस-सब के लिए अनेक रसायनों और प्रक्रियाओं की आवश्यकता पड़ती है , जिसे यहाँ विस्तार से नहीं बताया जा रहा है। फिर किसी फ्लोरोसेंट डाई के प्रयोग से विषाणु के डीएनए को चिह्नित कर लिया जाता है। यानी किसी व्यक्ति की नाक या गले से लिये गये नमूने की कोशिकाओं में सार्स-सीओवी 2 विषाणु के आरएनए से बना डीएनए होगा , तब ही फ्लोरोसेंट डाई के प्रभाव से नमूने में कोई रंग उत्पन्न होगा , अन्यथा नहीं। इस पूरी पद्धति को आरटी-पीसीआर (रिवर्स ट्रांस्क्रिप्शन पॉलिमरेज़ चेन रिएक्शन) का नाम दिया गया है। नाम से ही बात स्पष्ट है : विषाणु द्वारा अपने आरएनए से कोशिका के भीतर बनाये गये डीएनए को हमें अपनी प्रयोगशाला में पहचानना है और उसे चिह्नित करना है।

इस पूरी प्रक्रिया में क़दम-क़दम पर अत्यधिक सावधानी बरतनी पड़ती है। नमूने को ठीक से जमा करना , ठीक से लैब पहुँचाना , वहाँ ध्यान से स्वयं को सुरक्षित रखते हुए जाँच करना। पूरे प्रोटकॉल बनाये जाते हैं , फिर उनका पालन किया जाता है। एक भी स्थान पर असावधानी घटी नहीं कि निष्कर्ष ग़लत हुआ।

भारत-जैसे देश में आरटी-पीसीआर का व्यापक इस्तेमाल इस बात पर भी निर्भर रहेगा कि सस्ती आरटी-पीसीआर किटें उपलब्ध करायी जा सकें। हमारे समाज के ढेरों लोग पश्चिमी देशों की नकल नहीं कर सकते : इस नये संक्रमण की व्याप्ति बहुत है और ऐसे में बहुत महँगी जाँच सीमित रहने के कारण लोगों को कराने में समस्या आएगी। पुणे की मायलैब नामक कम्पनी ने छह सप्ताह के रिकॉर्ड समय में एक भारतीय किट विकसित की है , जिसे आयसीएमआर ने मान्यता दी है।

भारत अब-तक विदेश से किट मँगाकर कोरोना-संक्रमण की पुष्टि करता रहा है : इस भारतीय किट के बाद आशा है , स्थिति बदलेगी। विशेषी किटें महँगी होती हैं : यह भी एक कारण रहा है कि हम अपने यहाँ की जनता में कोरोना-संक्रमण की टेस्टिंग बहुत कम कर पाये हैं। सामान को बाहर से लाने की भी अपनी चुनौतियाँ हैं : ऐसे में भारत के भीतर ही जाँच के लिए किट विकसित करना ही सही तरीक़ा था। (बांग्लादेश के वैज्ञानिकों ने भी हाल ही में मात्र तीन डॉलर में एक आरटीपीसीआर किट बनायी है , जो मात्र पन्द्रह मिनट में कोरोना-संक्रमण की पुष्टि-अपुष्टि कर सकती है।)

इधर मायलैब का कहना है कि उनकी एक किट से सौ लोगों की जाँच की जा सकती है। ऐसे में देश को कई लाख किटों की बहुत शीघ्र ज़रूरत है।मायलैब सप्ताह-भर में लाख किटों के निर्माण की बात कह रही है। इतनी पर्याप्त नहीं होगा, हमें इससे भी अधिक तीव्रता से किट-निर्माण और उपलब्धि सुनश्चित करने होंगे।

कोविड-19 संक्रमण के लड़ाई अनेक चरणों में , अनेक स्तरों पर लम्बी चलनी है। इसके लिए ढेरों चुनौतियाँ हैं , जिनसे हमें पार पाना है। विषाणु-संक्रमण की पहचान के लिए विज्ञान की भरपूर सहायता वाणिज्य को करनी है। आशा और अपेक्षा है कि इसमें कोई कमी न रख छोड़ी जाएगी।

(लेखक लखनऊ स्थित डॉक्टर हैं और मेडिकल विषयों पर आम लोगों की बोलचाल में लिखने वाले लोकप्रिय लेखक हैं.)

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