कोरोना वायरस: सोशल स्टिगमा से बचाएं, दिल से दूरी नहीं बनाएं

  • घटना 1: दुबई से आये 11 लोग नवी मुंबई के अस्पताल में कोरोना वायरस की जांच कराकर भाग गये। उन्हें बाद में पकड़ा गया तो बहुत मिन्नत करने के बाद लौटे
  • घटना-2 -बिहार के दरभंगा मेडिकल कॉलेज के एक वार्ड में कोरोना वायरस का संदिग्ध मरीज बीच रात में भाग गया
मुंबई में तो और भी बुरा हुआ

वहीं मंबई में 66 साल के बुजूर्ग मरीज के साथ तो और बुरा हुआ। इंडियन एक्सप्रेस में छपी रिपोर्ट के अनुसार जब से उस बुजूर्ग को कोरोन वायरस की पुष्टि हुई तब से उनका सामाजिक बहिष्कार शुरू हो गया। उनके घर लोगों ने आना छोड़ दिया। काम करने वाली तक ने आने से मना कर दिया। बता इतनी तक नहीं रुकी, उन्हें हेट संदेश दिये जाने लगे। उनकी मौत की दुआ मांगे जाने लगी। अंत में उनकी मौत हो गयी। जबकि इस बीमारी के होने के पीछे कोई अपराध नहीं था।
उसी तरह दिल्ली में जब एक वृद्ध महिला की मौत हुई तो निगग बोध घाट पर उसके अंतिम संस्कार तक पर  आपत्ति जतायी गयी। इस घटना के बाद सरकार को इस बीमारी से मरने वाले मरीजों के अंतिम संस्कार के लिए पूरी गाइडलाइंस जारी करनी पड़ी।

इसलिए नहीं करा रहे मरीज जांच

जानकारों का मानना है कि सोशल स्टिगमा के कारण कई लोग प्रारंभिक लक्षण होने के बावजूद कोरोना वायरस की जांच करने से परहेज कर रहे हैं। तो कई मरीज जांच कराने के बाद भाग रहे हैं। मुंबई से चार मरीजों का जत्था चुपचार भा गया। बाद में वे एक ट्रेन में पकड़ में आए। एक दिन पहले सफदरजंग अस्पताल में एक संदिग्ध मरीज सातवें मंजिल से कूद गया और उसकी मौत हो गयी। बीमारी के बढ़ते सोशल स्टिगमा के बारे में एम्स के डॉ राकेश चावला ने कहा कि लोग इस कारण स्क्रीनिंग से घबरा रहे हैं कि क्योंकि उनके मन में अपराध बोध दिया जा रहा है कि वे लोगों के बीच बीमारी फैलाने वाले हैं। इसके बाद उन्हें अलग रहने में सामाजिक बहिष्कार का डर सताता है। इसके लिए हर किसी को सकारत्मक सोच विकसित करना चाहिए। यही कारण है कि कई देशों ने निम तक बना दिये कि अगर कोई संदिग्ध जांच कराने से भागता है तो उसके खिलाफ अापराधिक केस चलेगा। भारत में भी अब तक 170 मरीजों की पुष्टि हो चुकी है। जाहिर है यहां भी ऐसे मरीजों के अंदर किसी तरह का गलत भावना न पनपे न ही समाज इनके लिए गलत सोचे,इसके लिए बड़े पैमाने पर जागरूकता कार्यक्रम चलाने की जरूरत है।

कभी एड्स के साथ जुड़ा था स्टिगमा

एड्स बीमारी में सोशल स्टिगम जुड़ने के कई मामले आए थे। इनमें मरीजों के सामाजिक बहिष्कार करने के भी कई घटनाएं आयी थी। इसके बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन और कई सरकारों ने इसके लिए कड़े कानून बनाए और इन मरीजों को समाज की मुख्यधारा में लाने की पहल की। कोरोना के साथ तो ऐसी कोई गलत भ्रांति भी शामिल नहीं है। जाहिर है,लोगों को तत्काल जागरूक करने की जरूरत है और उन्हें बताना है कि इसके मरीजों से एहतियाती कुछ दिनों के लिए शरीर से दूर रहने की जरूरत है, दिल से दूरी बनाने की जरूरत नहीं है।

Facebook Comments