इबोला वायरस की खोज की। एचआईवी वायरस से लड़ा। एक दिन भी बीमारी के नाम पर छुट्टी नहीं ली। मगर इस बार कोरोना शरीर में गया और फिर …..

मेरे कमरे में तीन और मरीज थे। एक कोलंबिया का सफाईकर्मी और दूसरा बांग्लादेश का। हम तीनों डायबिटिक थे। लेकिन हम तीनों के पास इतनी उर्जा नहीं बची थी कि आपस में बात कर सकें।

इस वैज्ञानिक को वायरस से लड़ने और उनसे जीतने का लंबा तजुर्बा रहा है। इबोला वायरस की खोज की। एचआईवी वायरस से लड़े। लेकिन कोरोना के सामने अब संघर्ष कर रहे हैं। यह कहानी है लंदन स्कूल ऑफ हाईजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन के वैज्ञानिक और डायरेक्ट पीटर पियॉट की। कोरोना संक्रमण के वह शिकार हो गये थे। हालांकि इससे वह उबर गये हैं लेकन अभी भी पूरी तरह स्वस्थ नहीं हुए हैं।

मूल रूप से बेल्जियम निवासी पियॉट ने 1976 में इबोला वायरस की खोज करने वाले वैज्ञनिकों में एक थे। फिर 1995 से 2008 के बीच एचआईवी पर काबू करने वाली अहम टीम का हिस्सा बने रहे।

लेकिन उन खतरनाक वायरस से जीतने वाले इस वैज्ञानिक का कोरोना के सामने नजरिया ही बदल गया।

एक विज्ञान पत्रिका को दिये इंटरव्यू में पियॉट ने विस्तार से बात की और कोरोना के प्रति अपने नजरिये को रखा।

पढ़ें क्या कहा उन्होंने इस इंटरव्यू में-

उन्होंने अपने अनुभव को याद करते हुए कहा कि 19 मार्च के उन्हें अचानक तेज बुखार हुआ। तेज बदन दर्द हुआ। दर्द असहनीय था। मुझे खांसी तभी नहीं है। ऐसी सूरत में भी मैंने अपना काम जारी रखा। लंदन स्थित संस्थान को हमने बहुत ही मेहनत से खड़ा किया। पिछले एक साल में ग्लोबल वार्मिंग से लड़ने की दिशा में कई उल्लेखनीय काम भी हुए।

बुखार कम नहीं हुआ तो मैंने कोविड की जांच करायी। जैसी आशंका थी, पोजिटिव निकला। मैंने खुद को आइसोलेशन रूप में अलग कर लिया। बुखार जाने का नाम नहीं ले रहा था। पिछले दस सालों के दौरान मैं कभी बीमार नहीं हुआ था और एक दिन भी बीमारी के नाम पर छुट्टी नहीं ली थी। कोरोना सामने था और जंग भी लड़नी थी। इस लड़ाई में जो बात मेरे खिलाफ जाती थी वह थी मेरी उम्र। मैं 71 साल का हूं। मैं आशावादी हूँ। कोरोना से जंग जीतना चाहता था। लेकिन लड़ाई कठिन से और कठिन होती जा रही थी। 1 अप्रैल को डॉक्टर मित्रों ने मुझे और जांच कराने की सलाह दी क्योंकि मेरी हालत लगातार बद से बदतर होती जा रही थी।

शरीर में ऑक्सीजन की कमी होने लगी थी। हालांकि सांस लेने में परेशानी नहीं हो रही थी लेकिन फेफेड़े की रिपोर्ट बता रही थी कि मुझे निमोनिया हो चुका था। तब तक कोरोना निगेटिव मैं हो चुका था लेकिन वायरस अपना प्रभाव मेरे शरीर पर छोड़ चुका था जो कई हफ़्तों तक रहने वाला था। यहां मुझे पहली बार डर हुआ। मुझे लगा कि अब सांस की कमी को पूरा करने के लिए वेंटिलेटर पर देंगे। ऐसा करने का मतलब जान बचने की उम्मीद कम। लेकिन शुक्र था कि मुझे ऑक्सीजन मास्क दिया गया। आईसीयू में मैं आत्मसमर्पण करने लगा था। उम्मीदें धुंधली लगने लगी थी। यहां मैं सिफ मरीज था जिसे जीवन चाहिए था।

मेरे कमरे में तीन और मरीज थे। एक कोलंबिया का सफाईकर्मी और दूसरा बांग्लादेश का। हम तीनों डायबिटिक थे। लेकिन हम तीनों के पास इतनी उर्जा नहीं बची थी कि आपस में बात कर सकें। 40 सालों से वायरस से लड़ रहा थ। इसका आदी था। लेकिन इस बार हालात कुछ अलग थे। उसपर एक रिसर्च पढ़ा कि अगर आप कोविड मरीज हैं और किसी ब्रिटिश अस्तपाल में भर्ती हैं तो जिंदा बचने की उम्मीद 70 फीसदी ही रहती है। 2014 में पश्चिम अफ्रीका में जब इबोला से मरने वालों की औसत संख्या इतनी ही थी।

खैर, लंबे हफ्ते के बाद मुझ अंतत: अस्तपाल से छुट्टी मिल गयी। मैं अपने घर पब्लिक ट्रांसपोर्ट से लौटा। मैं शहर को देखना चाहता था। देखना चाहता था कि खाली सड़के, बंद बाजार, मॉल कैसे लगते हैं। इन बंदी के बीच ताजी हवा का अहसास कैस लगता है। गली में कोई नहीं था। मैं मांसपेशियों में आयी भयानक कमजोरी के कारण ठीक से चल नहीं पा रहा था।

घर के अंदर जाते ही मै खूब रोया। खुद को अलग कर रखना और मौत को इतने करीब से देखने का डर जेहन से नहीं जा रहा था। मेरे मन में नेल्शन मंडेला के प्रति श्रद्धा और बढ़ गयी थी जो 27 सालों तक बंद रखे गये बाहरी दुनिया से। अब तक मैं वायरस को दूर से देखता था। अब जब वह मेरे शरीर के अंदर जा चुका था,उसे देखने का मेरा नजरिया भी बदल गया था। इसने मुझे कमजोर बना दिया। बहुत कमजोर। लेकिन मैं लड़ता रहूंगा।

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