सार्स-सीओवी 2 को फ़्लू या फ़्लू-जैसा समझना भूल होगी; न यह फ़्लू है और न फ़्लू-जैसा है

डॉक्टर स्कंद शुक्ला

फ़्लू इन्फ़्लुएन्ज़ा को कहा जाता है। इन्फ़्लुएन्ज़ा-परिवार के विषाणु एकदम भिन्न विषाणु हैं , कोरोनाविषाणुओं को समझते समय हर समय उनकी बात करना ठीक नहीं। छह कोरोनाविषाणु मानव-प्रजाति में संक्रमण करते रहे हैं: एक-तिहाई लोगों को ज़ुकाम इन्हीं में से चार विषाणुओं के कारण हुआ करता है। पाँचवाँ सार्स है , जिसे सार्स-सीओवी 1 भी कहा जाता है और छठा है मर्स। ये दोनों मामूली ज़ुकाम नहीं पैदा करते , गम्भीर संक्रमण करते हैं। पर यह सातवाँ कोरोनाविषाणु इन छहों से कई मामलों में भिन्न है।

श्वसन-तन्त्र को संक्रमित करने वाले विषाणुओं के पसन्दीदा स्थान अलग-अलग होते हैं। कोई श्वसन-तन्त्र के ऊपरी हिस्से (नाक व गले) में वृद्धि करता है, तो किसी विषाणु को श्वसन-तन्त्र का निचला हिस्सा (श्वास-नलियाँ और फेफड़े) पनपने के लिए अधिक उचित स्थान लगता है। जो विषाणु श्वसन-तन्त्र के ऊपरी हिस्से में संक्रमण करते हैं, वे मामूली होते हैं किन्तु एक व्यक्ति से दूसरे में फैलते आसानी से हैं। जो निचले श्वसन-तन्त्र को संक्रमित करते हैं, वे गम्भीर संक्रमण तो करते हैं पर एक व्यक्ति से दूसरे में मुश्किल से जाते हैं।

सार्स-सीओवी 2 अलग है। अपने संरचना में मौजूद फ़्यूरिन नामक रसायन के कारण यह श्वसन-तन्त्र के ऊपरी और निचले हिस्सों, दोनों को संक्रमित कर सकता है। वैज्ञानिक यह भी अनुमान लगा रहे हैं कि यह विषाणु मनुष्य में लक्षण पैदा करे, इससे पहले ही यह एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में भी जा सकता है। यानी संक्रमित व्यक्ति के बीमार होने से पहले ही दूसरे में भी पहुँच जाना ! (यद्यपि इस तरह की जानकारियों को ठोस रूप लेने में अभी समय लगेगा , यह सच है।)

पैंडेमिक के आरम्भ से ही इस विषाणु ने महत्त्वपूर्ण ढंग से अपनी आनुवंशिकी नहीं बदली। (विषाणु में सौ से अधिक म्यूटेशन तो पाये गये, पर कोई भी बहुत महत्त्वपूर्ण नहीं है।) क्यों बदले? इसपर बदलाव का कोई दबाव ही नहीं है। सामने संक्रमित होने के लिए बिलियनों अप्रतिरक्षित मनुष्य हैं: विकासवाद के सिद्धान्त के अनुसार एक-व्यक्ति से दूसरे में पहुँचने के लिए विषाणु को संघर्ष नहीं करना है। निर्बाध ढंग से वह संक्रमण फैलाता पृथ्वी-भर में विचर रहा है।

कोरोनाविषाणुओं पर शोध करने वाले वैज्ञानिकों को सन् 2003 तक गम्भीरता से नहीं लिया जाता था। न ढंग से फंडिंग, न सुविधाएँ। रिसर्च के लिए एचआईवी है, इबोला है, मारबर्ग है, निपाह है। और नहीं तो डेंगी है, चिकनगुन्या है, इन्फ़्लुएन्ज़ा भी तो है! फिर सन् 2003 में सार्स ने कुछ हद-तक मामला बदल दिया। विज्ञान के दानदाताओं को लगा कि हाँ, कोरोनाविषाणु भी कुछ महत्त्व रखते हैं।

अब सन् 2020 में स्थिति एकदम बदल चुकी है। जितना चाहो पैसा ले लो, जो चाहो सुविधा ले लो। कोई रोक-टोक नहीं। जितना चाहे शोध करो। पर टीका जल्दी बना दो, एंटीवायरल दवा ही मुहैया करा दो।

कोरोनाविषाणुओं ने विषाणुओं की फेहरिस्त में अपनी कुख्याति पा ली है और कोरोना-विषाणु-वैज्ञानिकों ने अपने लिए सम्मान।

देखन में छोटन लगें , घाव करें गम्भीर!

(लेखक लखनऊ स्थित डॉक्टर हैं और मेडिकल विषयों पर आम लोगों की बोलचाल में लिखने वाले लोकप्रिय लेखक हैं.)

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