भारत के स्वास्थ्य ढाँचे की परीक्षा है कोरोना

अनमोल गुप्ता

  • विश्व स्वास्थ्य संगठन ने आज ‘विश्व स्वास्थ्य दिवस’ को कोरोना से लड़ाई लड़ने वाली नर्सों और अन्य स्वास्थयकर्मियों को समर्पित किया है
  • भारत अपनी जीडीपी का सिर्फ़ 1.4 फ़ीसदी ही स्वास्थ्य पर खर्च करता है
  • भारत स्वास्थ्य देखभाल, गुणवत्ता व पहुंच के मामले में 195 देशों की सूची में 145वें स्थान पर है।

 

आज संपूर्ण विश्व कोरोना वायरस (कोविड-19) से जूझ रहा है। ऐसे समय में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने प्रत्येक वर्ष 7 अप्रैल को मनाये जाने वाले ‘विश्व स्वास्थ्य दिवस’ पर इस महामारी से लड़ने में सबसे अगली पंक्ति में खड़ी नर्सों और अन्य स्वास्थयकर्मियों को ये दिन समर्पित किया है। भारत में भी कोरोना के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। लोग दहशत में हैं और सरकारी अस्पताल भेजे जाने के ख्याल से भी डरे हुए हैं। देश के कई हिस्सों से कोरोना के संदिग्ध मरीजों के अस्पताल से भागने की खबरें आ रही हैं। साथ ही मीडिया में कई सारी रपट इस बारे में भी आई हैं कि कुछ जगहों पर डॉक्टरों एवं नर्सो के पास पीपीई यानी पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट, मेडिकल मास्क और सुरक्षा के अन्य ज़रूरी सोजोसामान उपलब्ध नहीं हैं, जिससे वे ख़ुद को संक्रमण से बचा सकें।

ऐसे में सवाल ये उठता है कि संकट की इस घड़ी में भारत सरकार ने कोरोना से लड़ने के क्या इंतज़ाम किए हैं? क्या देश की ऐसी हालत है कि वो इस समय एक बड़ी जनसंख्या को स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध करा सके ? वैसे आँकड़े तो भयावह हैं। जिस देश में स्वास्थ्य पर जीडीपी का मात्र 1.4 फ़ीसदी ही खर्च किया जाता हो, उस देश की स्वास्थ्य सुविधाओं की हालत कैसी होगी, इसका बस अंदाज़ा लगाया जा सकता है। शोध एजेंसी ‘लैंसेट’ ने अपने ‘ग्लोबल बर्डेन ऑफ डिजीज’ के अनुसार, भारत स्वास्थ्य देखभाल, गुणवत्ता व पहुंच के मामले में 195 देशों की सूची में 145वें स्थान पर है।

कोरोना की जाँच में पिछड़ रहे हैं हम

इंडियन एक्सप्रेस अख़बार की एक रिपोर्ट के अनुसार, हमारे देश में कोरोना से लड़ने के लिए 11,600 भारतीयों पर एक डॉक्टर और 1826 भारतीयों पर मात्र एक बिस्तर है। देश के अलग-अलग राज्यों में ये स्थिति और भी खराब है। अभी देश में सिर्फ सीमित मात्रा में यानी जो लोग विदेश से आए हैं और जो लोग उनके सीधे संपर्क में आए हैं, सिर्फ उन्हीं का कोरोना टेस्ट हो रहा है। इतनी बड़ी आबादी के लिए इतनी कम मात्रा में टेस्ट को विशेषज्ञ नाकाफ़ी बता रहे हैं। फ़िलहाल देश के 52 सरकारी लैब में ही कोरोना वायरस के टेस्ट की सुविधा हैं। अभी भारत में कुल 47,951 कोरोना संदिग्ध मरीजों की जांच की गई है, जिसमें से अब तक 4000 से ज्यादा पॉजिटिव केस सामने आए हैं । हालाँकि अगर सैंपल साइज बढ़ाया जाए, तो जाहिर तौर पर देश में कोरोना पॉजिटिव केस और बढ़ेंगे। सरकार कह रही है कि वह बहुत जल्द देश के सभी मेडिकल कॉलेजों व सरकारी प्रयोगशालाओं में भी कोरोना वायरस की जाँच शुरु करेगी।

भारत में हो सकते हैं 30 करोड़ लोग कोरोना की जद में

बीबीसी से बातचीत में सेंटर फॉर डिज़ीज डायनेमिक्स के निदेशक डॉ. रामानन लक्ष्मीनारायण ने बताया है कि कोरोना वायरस का कम्युनिटी ट्रांसमिशन अब तेज़ी से बढ़ रहा है और हर एक पॉजिटिव केस दो नए केस बढ़ा रहा है। उन्होंने आशंका जताई है कि भारत में करीब 20 फ़ीसदी आबादी इस वायरस से संक्रमित हो सकती है। 20 फ़ीसदी आबादी का मतलब है करीब 30 करोड़ लोग इसकी जद में आ चुके हैं। ये आँकड़े डराने वाले हैं। लक्ष्मीनारायण का मानना है कि हर पांच में से एक व्यक्ति संक्रमण के गंभीर स्तर पर होगा। यानी 40 से 50 लाख लोग गंभीर स्थिति में होंगे और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराने की ज़रूरत पड़ेगी। अब सवाल यह उठता है कि क्या भारत इतनी बड़ी संख्या में लोगों को बेहतर इलाज उपलब्ध कराने में सक्षम है? क्या उनको जीवनदायक वेंटिलेटर उपलब्ध हो सकेगा?

बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव

कोरोना के बढ़ते प्रकोप के बीच अस्पतालों पर दबाव बढ़ता जा रहा है। संक्रमित लोगों की जान बचाने के लिए बुनियादी जरूरतों के अभाव ने गंभीर चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। इनमें वेंटिलेटर सबसे अहम माना जा रहा है। इंडियन एक्सप्रेस अख़बार की एक रिपोर्ट के अनुसार, कोरोना के मरीजों के लिए भारत में 84 हज़ार लोगों पर मात्र एक आइसोलेशन बेड है और 36 हजार लोगों पर सिर्फ एक क्वारेंटाइन बेड। भारत में स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति बेहद ही खराब है। इंडियन सोसायटी ऑफ क्रिटिकल केयर के अनुसार, देश की 130 करोड़ आबादी के लिए हमारे पास लगभग 40 हज़ार वेंटिलेटर हैं। ये भी ज्यादातर सरकारी मेडिकल कॉलेज, मेट्रो शहरों के निजी अस्पतालों व सेमी मेट्रो शहरों के अस्पतालों में ही उपलब्ध हैं।

विशेषज्ञों के मुताबिक, कोरोना संक्रमण से हालात बिगड़ने की स्थिति में 15 मई तक देश में एक लाख से लेकर 2.2 लाख वेंटिलेटर की जरूरत हो सकती है। इसे देखते हुए आईआईटी कानपुर ने मदद का हाथ बढ़ाया है। आईआईटी ने पोर्टेबल वेंटिलेटर के साथ दूसरे जरूरी उपकरणों की तकनीक विकसित करने पर काम शुरू भी कर दिया है। वह एक महीने में एक हजार वेंटिलेटर तैयार करेगा। इसमें कई संस्थाएं सहयोग कर रही हैं। आईआईटी कानपुर कई और उत्पादों के प्रोटोटाइप बनाने की भी तैयारी कर रहा है। इनोवेशन एंड इंक्युबेशन हब के इंचार्ज प्रो.अमिताभ बंदोपाध्याय के मुताबिक, भारत में मौजूदा स्थिति को देखते हुए एक माह में अभी 50 हजार पोर्टेबल वेंटिलेटर की आवश्यकता है।

देश में निजी स्वास्थ्य सेवाओं का बोलबाला

भारत में स्वास्थ्य सेवाओं में निजी क्षेत्र की बड़ी हिस्सेदारी है। वैश्विक चिकित्सा उपकरण परामर्श कंपनी एमर्गो के अनुसार, भारत में सार्वजनिक और निजी क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाओं पर खर्च की भागीदारी का अनुपात 30:70 का है। चीन में ये अनुपात 56:44, ब्राजील में 46:54 और यूरोप में 78:22 है।

भारत में मध्यवर्गीय परिवारों से लेकर उच्च मध्यवर्गीय परिवार तक, सभी निजी अस्पतालों में इलाज कराना चाहते हैं। सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की लचर हालत इसके लिए मुख्य रूप से ज़िम्मेदार है। लेकिन कोरोना ने भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने एक नई चुनौती पेश की है। अगर समय रहते इससे लड़ने के ज़रूरी उपाय नहीं किए गए तो इसके गंभीर परिणाम होंगे और बड़ी तादाद में लोगों के मरने की आशंका है।

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