एपिसोड 8: एक डॉक्टर की डायरी, कोविड काल में

कोविड मरीजों के बीच एक डॉक्टर को कैसा महसूस होता है। किन अनुभवों के साथ वे गुजरते हैं। नार्वे में पदस्थापित भारतीय मूल के डाक्टर और लोकप्रिय लेखक डॉ प्रवीण झा Healthwire के पाठकों लिए एक खास सीरिज लिख रहे हैं। एपिसोड 8 के साथ ही आज ये स्पेशल सीरीज ख़त्म हो रही है।

डॉक्टर प्रवीण झा

अब कोरोना के मरीज नहीं आते। वेंटिलेटर खाली हो गए। स्कूल खुल गए। ऑफ़ीस खुल गए। इक्के-दुक्के केस कहीं देश में मिल गए तो मिल गए। फिर भी, वही रूटीन अब भी चल रहा है। वही जाँच-पड़ताल, पूछ-ताछ। ढिलाई हर जगह दी जा सकती है, लेकिन अस्पताल में नहीं। आखिर यह रोगियों का केंद्र है। अगर कोरोना संक्रमित किसी भी लक्षण से आएगा, तो यहीं आएगा। इसलिए मैंने कहा कि अस्पतालों पर नजर बनानी सबसे अधिक जरूरी है। कोरोना के बाद भी।

इस रोग ने हमें एक जीवन-शैली दी है। साफ-सुथरी जीवन-शैली। हम अगर इसे जीएँ तो किसी भी संक्रामक रोग की समस्या घट जाएगी। बेवजह गंदे हाथ मिलाना, चिपकना, बिना हाथ धोए खाना। ये आदतें बंद हुई हैं तो बंद ही रहे। डिज़िटल दुनिया से भीड़-भाड़ वाले देशों में यथासंभव भीड़ घटे। प्रदूषण घटे।

अगर नॉर्वे में केस घट गए, तो धीरे-धीरे दुनिया भर में घट ही जाएँगे। जिस तरह से रोग आया था, उसी तरह से जा भी रहा है। चीन से शुरुआत हुई थी, वहाँ से चला गया। अगले फेज़ में ईरान और यूरोप में आया, वहाँ तबाही मचा कर अब लौटने लगा है। भारत और अमेरिका में आखिरी फेज़ में बढ़ना शुरू हुआ, तो वहाँ भी घटेंगे ही। कोरोना कहीं नहीं लुप्त होने वाला, लेकिन संक्रमण और लक्षण घटते चले जाएँगे।

मेरी डायरी में भी अब लिखने को कुछ नहीं बचा। जब रोग ही नहीं रहा, तो क्या लिखूँ? एक उम्मीद की किरण छोड़ कर जा रहा हूँ कि अगले महीने तक पूरी दुनिया से कोरोना घटना शुरू हो जाएगा। अगर केस मिलते भी रहे तो मरने वालों की संख्या घटेगी। लेकिन, कोरोना भले चला जाए, हमें अपनी जीवन-शैली जरूर सुधार लेनी है। ताकि हम लड़ते रह सकें।

(अगर डॉक्टर से कुछ जानने की जिज्ञासा हो या कोई सवाल तो मेल करें-[email protected] पर)

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