वैज्ञानिक-समाज किस तरह से अपने-आप को संक्रामकता से सुरक्षित रखता है?

दुनिया-भर के वैज्ञानिक किस तरह से सार्स-सीओवी 2 विषाणु को बेहतर जानने और समझने में लगे हैं? वैज्ञानिक-समाज किस तरह से अपने-आप को संक्रामकता से सुरक्षित रखता है?        

विषाणु, जीवाणु व इस तरह से सभी अन्य रोगकारक कीटाणु बायोहैज़ार्ड यानी जैविक ख़तरे के अन्तर्गत आते हैं। इनके शोध के दौरान उचित ध्यान न रखने पर वैज्ञानिक भी इनसे संक्रमित होकर बीमार पड़ सकते हैं। ऐसे में बायोसेफ्टी अर्थात् जैविक सुरक्षा की बात उठती है। किस तरह से वैज्ञानिक उचित क़दम उठाकर स्वयं, अपने साथियों , अपनी प्रयोगशाला और फिर समाज को संक्रमण से सुरक्षित रखे  —— यह बहुत महत्त्वपूर्ण हो जाता है। पूरी दुनिया में इसी महत्त्व को ध्यान में रखते हुए, बायोसेफ्टी के लेवेल यानी स्तर तय किये गये हैं। लघुरूप में बायोसेफ्टी-लेवेलों को बीएसएल कहा जाता है। प्रत्येक बीएसएल में कीटाणु-संक्रमण के फैलाव की रोकथाम के लिए अलग-अलग तरह के क़दम उठाये जाते हैं। संक्रमण का जोखिम कितना है, संक्रामक कीटाणु से होने वाला रोग कितना गम्भीर है, कीटाणु का एक व्यक्ति से दूसरे में प्रसार कैसे होता है और प्रयोगशाला में कीटाणु के साथ किस तरह का शोध किया जाता है —- ये सभी बातें किसी भी कीटाणुसम्बन्धी कार्य करने वाली प्रयोगशाला की बीएसएल-लेवेल को तय करती है। अलग-अलग बीएसएल-स्तर की प्रयोगशाला की संरचना भिन्न होती है, उपकरण अलग होते हैं और काम करने का ढंग भी। 

बीएसएल-लेवेल चार हैं। पहले बीएसएल-स्तर पर सबसे कम जोखिम वाले कीटाणुओं पर काम होता है और उत्तरोत्तर यह जोखिम दूसरे , तीसरे और चौथे बीएसएल-स्तर तक बढ़ता जाता है।  बीएसएल-स्तर एक प्रयोगशाला में काम करने वाले वैज्ञानिक उन कीटाणुओं पर काम कर रहे होते हैं, स्वस्थ व्यक्तियों में हमेशा रोग उत्पन्न नहीं करते। वैज्ञानिकों और उनकी प्रयोगशालाओं को उनसे ख़तरा अन्य बीएसएल-स्तरों की तुलना में काफ़ी कम होता है। उदाहरण के लिए इश्चरेचिया कोलाई नामक जीवाणु को लीजिए। यह जीवाणु मनुष्यों की आँतों में पाया जाता है और हमेशा रोग उत्पन्न नहीं करता। इसपर काम करने के लिए बीएसएल-स्तर एक की प्रयोगशाला उचित है। कीटाणु की संक्रामकता और उससे होने वाले रोगों के अनुरूप प्रयोगशाला में आवश्यक उपाय किये जाते हैं।

बीएसएल-स्तर दो प्रयोगशाला में जिन कीटाणुओं पर शोध किये जाते हैं, वे प्रयोगशाला व उसके वैज्ञानिकों के लिए मध्यम रूप से ख़तरनाक होते हैं। इनका स्थानीय फैलाव हुआ करता है और इनसे तरह-तरह के रोग हुआ करते हैं। इस तरह की प्रयोगशाला में स्टेफायलोकोकस ऑरियस जैसे जीवाणुओं पर काम किया जाता है। बीएसएल-स्तर एक की तुलना में स्तर दो की प्रयोगशाला में संक्रमण की रोकथाम के तरीक़े बेहतर और उन्नत होते हैं। 

बीएसएल-स्तर तीन की प्रयोगशाला में जिन कीटाणुओं पर काम होता है, उनका जोखिम स्तर दो बीएसएल से अधिक होता है। ये कीटाणु स्थानीय भी हो सकते हैं और बाहरी भी। कई श्वाससम्बन्धी कीटाणुओं पर —- जो मनुष्यों में गम्भीर या मृत्युकारी रोग उत्पन्न करते हैं —- बीएसएल तीन प्रयोगशालाओं में वैज्ञानिक काम करते हैं। मायकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस जिससे टीबी रोग होता है, उसके लिए भी बीएसएल तीन प्रयोगशालाओं का प्रयोग किया जाता है। 

बीएसएल-स्तर चार प्रयोगशालाएँ सर्वोच्च स्तर की सूक्ष्मजैविकी-प्रयोगशालाएँ हैं। एग्जॉटिक व सबसे गम्भीर रोग करने वाले कीटाणुओं जैसे एबोला व मारबर्ग-विषाणुओं पर इनमें काम किया जाता है। बहुधा इस प्रयोगशाला के कीटाणुओं के खिलाफ़ न कोई दवा है और न कोई टीका। नन्ही एरोसॉल (बूँदों) से ये कीटाणु फैलते हैं। बीएसएल-स्तर  चार प्रयोगशालाएँ बहुत कम हैं: इनका रखरखाव बहुत महँगा होता है। 

वर्तमान कोविड-19 को जन्म देने वाले विषाणु सार्स-सीओवी 2 विषाणु पर शोध करने के लिए वैज्ञानिकों को विश्व-स्वास्थ्य-संगठन बीएसएल स्तर दो और तीन की प्रयोगशालाओं का सुझाव व निर्देश दे रहा है। इसमें भी दोनों स्तरों की प्रयोगशालाओं का प्रयोग अलग-अलग कामों के लिए करने की बात है। विषाणु को उगाने (कल्चर) व अन्य शोधकार्यों जैसे आयसोलेशन जैसे कार्यों के लिए बीएसएल तीन प्रयोगशाला का इस्तेमाल किया जाए। इसमें विषाणु-संक्रमण का जोखिम अधिक है। जिन शोधों में विषाणु को उगाना नहीं है और कोई जोखिमभरा शोध नहीं हो रहा है, उसके लिए बीएसएल दो का प्रयोग हो। 

(पुनश्च: इस लेख में जानबूझकर विस्तार से बीएसएल के चारों स्तरों की प्रयोगशालाओं के उपकरणों व विधियों की विस्तृत जानकारी नहीं दी गयी है।) 

(लेखक लखनऊ स्थित डॉक्टर हैं और मेडिकल विषयों पर आम लोगों की बोलचाल में लिखने वाले लोकप्रिय लेखक हैं.)

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