कोरोना वायरस का संकट खत्म होने के बाद हमारे जीवन, व्यवस्था और पॉलिटिकल इकॉनमी में कौन से परिवर्तन आने की प्रबल संभावना है?

मुरारी त्रिपाठी

कोरोना वायरस का संकट खत्म होने के बाद हमारे जीवन, व्यवस्था और पॉलिटिकल इकॉनमी में क्या परिवर्तन आने की प्रबल संभावना है… अलजजीरा ने अलग-अलग क्षेत्रों के विशेषज्ञों से बात करके एक रोचक आलेख तैयार किया है… उसकी मुख्य बातें यहां साझा कर रहा हूं…

टेक्नोलॉजी में डील करने वाली कंपनियां और भी अधिक शक्तिशाली हो जाएंगी

जैसा कि आप देख रहे हैं कि कोरोना वायरस की वजह से परंपरागत बिजनेसेस पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है, लेकिन वहीं ऑनलाइन सेवाएं देने वाली कंपनियां इस समय अधिक मुनाफे में चल रही हैं. एक तरीके से देखा जाए तो टेक्नोलॉजी में डील करने वाली कंपनियों की वजह से हम इस महामारी के सामने टिके भी हैं. सब लोग घर में बंद हैं, लेकिन उनके पास जो स्मार्टफोन है वो सूचनाएं हासिल करने और दुनिया को एक तरह से ज्यादा से ज्यादा देखने का जरिया है.

महामारी से पहले लोग टेक कंपनियों को लेकर आशंकित भी थे लेकिन महामारी के खत्म होने के बाद वे ज्यादा से ज्यादा इनपर निर्भर होते जाएंगे. फेसबुक, गूगल इत्यादि बड़ी टेक कंपनियों के साथ छोटी टेक कंपनियां भी मजबूत होती जाएंगी.

टेक्नोलॉजी के जरिए कोरोना वायरस से लड़ा जा रहा है. इजरायल ने कोरोना संदिग्ध लोगों को ट्रैक करने के लिए उनके स्मार्टफोन को सर्विलांस पर ले रखा है. दक्षिण कोरिया ने ऐसी एप बनाई है, जो एक व्यक्ति को उसके 100 मीटर के दायरे में कोरोना ग्रसित और संदिग्ध व्यक्ति के बारे में जानकारी देती है. इस तरह आने वाले समय में विभिन्न देश की सरकारें कोरोना के संभावित खतरे से लड़ने के नाम पर सर्विलांस और ज्यादा बढ़ा देंगी, जिससे अंतत: एक नागरिक की निजता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता में और ज्यादा कमी आ जाएगी.

कम अंतरराष्ट्रीय सहयोग, कमजोर सरकार वाले देशों में अराजकता

नया कोरोना वायरस चौथी औद्योगिक क्रांति की गति को बहुत तेज कर देगा और लगभग सभी लोक सेवाओं का डिजिटलाइजेशन हो जाएगा. समाज और राज्य के बीच संबंध एक तरीके से और अधिक डिजिटल या रिमोट हो जाएगा. सुरक्षा के बदले नागरिकों को अपने ज्यादा से ज्यादा अधिकार, निजी जानकारी और व्यक्तिगत स्वतंत्रता सरकारों के हवाले करनी होगी. नागरिक खुद इसकी सहमति देंगे क्योंकि उन्हें बीमारी का डर होगा. इससे राज्य की ताकत बढ़ती जाएगी और नागरिक की कम होती जाएगी.

लोगों के मन में संक्रमण का डर इस कदर बैठा रहेगा कि बाहरी और विदेशी के डर से राष्ट्रवाद और क्षेत्रवाद की भावना प्रबल बनी रहेगी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहयोग कम होता जाएगा.

पूरी दुनिया में ऐसे बहुत से देश हैं जो कोरोना से लड़ने में बिल्कुल सक्षम नहीं हैं. इन देशों में लाखों लोग सड़कों पर इकट्ठे होंगे और कमजोर सरकारों को हटाने का प्रयास करेंगे.

हमारे मूल्यों और आदतों में बड़ा परिवर्तन होगा

कोरोना वायरस के संकट के बाद लोगों के काम करने और यात्रा करने का तरीका बदल जाएगा. वो जिस तरीके से खाते हैं, लोगों से मिलते हैं, जिस तरह से रहते हैं, सभी चीजों में बदलाव आएगा. कोरोना के दौरान इन सब चीजों में बदलाव आया है और लंबे समय तक ऐसा करते रहने से ये सब नई आदतें बन जाएंगी. दिमाग अलग तरह से काम करने लगेगा.

कोरोना वायरस संकट लोगों को यह एहसास दिलाएगा कि सामूहिकता की ताकत क्या होती है और अगर सब लोग मिलकर एक ही काम में लग जाएं तो क्या-क्या हासिल नहीं किया जा सकता. लोग सामूहिकता की इस नई और बढ़ी हुई भावना का प्रयोग दूसरे लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए भी करेंगे. कोरोना वायरस के दौरान शेष समाज से दूरी उन्हें इसका महत्व समझाएगी.

स्वास्थ्य व्यवस्था में बड़े बदलाव होंगे, क्रांति की हद तक

कोरोना वायरस संकट के बाद लोग इससे इतना ज्यादा डर जाएंगे कि स्वास्थ्य सेवाओं को परमाणु विशस्त्रीकरण और आतंकावाद से सुरक्षा के बराबर समझा जाने लगेगा. इसके फलस्वरूप जनता सरकारों से यूनिवर्सल हेल्थ केयर की मांग करेगी. जनता कोरोना वायरस का हवाला देकर अपनी इस मांग को बढ़ाएगी. चुनावों में यह एक प्रमुख मुद्दा बनेगा. सरकारों को इस ओर खर्च करना ही पड़ेगा.

धर्म का सार, उसकी आत्मा खतरे में पड़ जाएगी

कोरोना वायरस संकट के समय विभिन्न धर्मों पर सबसे नकारात्मक प्रभाव पड़ा है. आधुनिक इतिहास में पहली बार शिया और सुन्नी पवित्र धर्मस्थल बंद पड़े हैं. चर्च और प्रमुख मंदिर बंद हैं. धार्मिक सभाए नहीं हो रही हैं. सरकारें खुद विभिन्न धार्मिक स्थलों को बंद रखने का आदेश दे रही हैं, लोग भी समर्थन कर रहे हैं. उन्हें यह भी दिख रहा है कि इस तरह के वायरस से कोई भगवान, अल्लाह और गॉड उन्हें बचाने में सक्षम नहीं है.

वायरस खत्म होने के बाद लोग सामूकिता से बचेंगे. ठीक है, वो ऑनलाइन तरीके से उपदेश सुन लेंगे या मंत्रोच्चारण कर लेंगे… लेकिन धर्म की आत्मा तो उसकी सामूहिकता उसके धार्मिक क्रियाकलापों में हैं… कोरोना से डरे लोग पवित्र धार्मिक स्थलों पर लाखों की संख्या में इकट्ठा होने से बचेंगे. पुजारी, पादरी, हाजी इत्यादि से मिलकर आशीर्वाद लेने से बचेंगे. बड़े-बड़े धार्मिक आयोजन कराने से पहले सोचेंगे. धर्म पहले की तरह नहीं रह जाएगा.

अंतरराष्ट्रीय व्यापार मजबूत होगा, असमानता घटेगी

कोरोना वायरस ने हमें बताया है कि वैश्विक स्तर पर व्यापार रुक जाने से अर्थव्यवस्था पर कितना नकारात्मक असर पड़ता है. इससे ये भी पता चला है कि आर्थिक रूप से हम वैश्विक स्तर पर एक-दूसरे पर कितने अधिक आश्रित हैं. महामारी के खत्म हो जाने के बाद वैश्विक व्यापार और मजबूत होगा क्योंकि लोग इसकी कीमत समझेंगे.

राष्ट्रीय स्तर पर यह महामारी कई सरकारों को उनकी सामाजिक नीतियों पर फिर से विचार करने के लिए मजबूर कर रही है. बड़े-बड़े पूंजीवादी देश समाजवादी कदम उठा रहे हैं. सरकारें सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य सुरक्षा पर अपनी नीतियां बदल रही हैं. असंगठित क्षेत्र के कामगारों के बारे में बहुत ध्यान दिया जा रहा है. लोगों के दबाव की वजह से अगर ये नीतियां महामारी के बाद बनी रहती हैं तो इससे आर्थिक असमानता में कमी आएगी.

(लेखक पेशे से पत्रकार हैं. दिल्ली में रहते हैं. इनकी पत्रकारिता के केंद्र में आम लोग हैं. सोशल जस्टिस पर प्रोग्रेसिव तरीके से सोचने का प्रयास करते हैं.)

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