कोरोना को ‘इन्फोडेमिक’ बनाने से बचना होगा

अब लोग कई लेख-अफवाह आदि पढ़ कर कोरोना-विशेषज्ञ बन गए होंगे। WHO के निदेशक ने पिछले महीने इस बीमारी को ‘इन्फोडेमिक’ कहा कि लोग महामारी से अधिक सूचना-मारी से मर जाएँगे। सोचिए कि एक अस्सी साल के बुजुर्ग जिन्हें हृदयाघात आ चुका है, जब रोज इटली की खबरें टीवी पर सुनते होंगे तो कैसी नींद सोते होंगे? कोरोना तो बाद में आएगा, वह इस अवसाद भरे माहौल से दम तोड़ देंगे। इटली की खबर में सच्चाई है और मैंने भी पहले (पोस्ट 6.) लिखा है, लेकिन चिकित्सक इस सच्चाई का ढिंढोरा उनके समक्ष भला क्यों पीटें? परिजन भी क्यों डराएँ?

यह बात कोई रहस्य नहीं कि अमुक बुजुर्ग ने ये अस्सी बसंत किन-किन विषाणुओं और जीवाणुओं के मध्य रह कर गुजारे होंगे। पटेल चेस्ट संस्थान दिल्ली के केंद्र में है, जहाँ तपेदिक के मरीज यूँ ही चाय पीते मिल जाएँगे, और नॉर्थ कैम्पस के कपल भी वहीं साथ बैठे। कभी यही तपेदिक एक अभिशाप था, लेकिन हालात कुछ यूँ बने कि लाखों लोग गुप्त तपेदिक या पुराने तपेदिक के साथ लंबा जीवन जी गए। भारत में इबोला और नीपा जैसे 77-95 % मृत्यु-दर वाले खूँखार वायरस आकर भी आतंक न मचा सके। येल्लो फीवर आया ही नहीं।

कोरोना की ही बात करें तो पहले SARS आया (2003), विश्व के 29 देशों में फैला, हज़ारों लोग मरे। भारत में मात्र तीन मरीज मिले, और तीनों ठीक हुए। MERS (कोरोना का दूसरा वायरस) पूरे मध्य एशिया में कहर मचाता रहा, और कई भारतीय वहाँ से आते-जाते रहे, लेकिन भारत में एक मरीज न मिला। और अब यह तीसरा कोरोना। यह भी अब नहीं आया, फरवरी में ही आ गया, और डेढ़ महीने तक सुस्त रहा। वूहान में जब यह चरम पर था, तब जो 327 भारतीय वहाँ से लाए गए, उनमें भी नहीं मिला। वे आखिर कैसे बच गए? और जो अब मर रहे हैं, वे क्यों मर रहे हैं?

इसका उत्तर भी वहीं छिपा है कि इस फौलादी इम्युनिटी के बावजूद भारत में औसत आयु कम है। हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था का वितरण विषम है। उम्र के साथ ‘हाइ रिस्क ग्रुप’ यानी हृदय-रोग, रक्तचाप, गुर्दा-रोग, या जीवनशैली समस्याओं के समूह बढ़ते जा रहे हैं। इस वायरस में यह ख़ास देखा गया है कि उम्र और पुराने मर्जों से कमजोर व्यक्ति टूट जाता है। पंजाब में मृत्यु हृदयाघात से, तो पटना में मृत्यु गुर्दा रोग के मरीज की होती है। पटना के मरीज की कम उम्र में ही किडनी की समस्या थी। आने वाले समय में ऐसी मृत्यु और भी कई होगी।

लेकिन, इसे ‘इन्फोडेमिक’ बनाने से बचना होगा। क्रिकेट स्कोर की तरह रोज पूछना कि आज कितने? इससे अब चिकित्सक भी टूटने लगे हैं, जनता तो खैर टूटेगी ही। हाँ! यह पूछिए कि आज कितनों की इम्युनिटी ने वायरस को मात दिया? साठ से ऊपर के टॉम हैन्क्स दंपति कोरोना पाले घर पर बैठे हैं, और दूसरे हफ्ते में कह रहे हैं कि अब तक स्वस्थ हैं। ऐसी और भी कहानियाँ रोज मिलेगी, जिनका शरीर लड़ रहा है। हम संभल कर रहें, पॉजिटिव रहें, हमारा भी लड़ेगा।  

(प्रवीण झा नार्वे के एक अस्पताल में डॉक्टर है. वे चिकिस्ता से लेकर साहित्य विषयों के अग्रणी और लोकप्रिय लेखक हैं.)

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