एपिसोड 7: एक डॉक्टर की डायरी, कोविड काल में

कोविड मरीजों के बीच एक डॉक्टर को कैसा महसूस होता है। किन अनुभवों के साथ वे गुजरते हैं। नार्वे में पदस्थापित भारतीय मूल के डाक्टर और लोकप्रिय लेखक डॉ प्रवीण झा Healthwire के पाठकों लिए एक खास सीरिज लिख रहे हैं।

डॉक्टर प्रवीण झा

हम सुबह काम पर आ रहे हैं। अपनी मेज साफ कर रहे हैं। कीबोर्ड पोछ रहे हैं। दरवाजे का नॉब साफ कर रहे हैं। कि कहीं कोई वायरस चिपका न हो। लेकिन, क्या रात भर वायरस वहाँ पड़ा होगा? शायद नहीं। लेकिन, यह रूटीन बन जाने से बात कोरोना की ही नहीं, सामान्य साफ-सफाई की हो जाती है। यह जरूरी है। कोरोना मेरे टेबल की कीबोर्ड पर कहाँ से आ सकता है? कहीं दूर लेटे मरीज से उड़ कर मेरे विभाग के मेरे चैम्बर तक आना मुश्किल है। कोरोना को एक वाहन की जरूरत है, जिस पर बैठ कर आए। अगर कोई उस मरीज से गले मिल कर आए, हाथ लगा कर आए, और फिर मेरे चैम्बर में आकर की बोर्ड छूए, तो भी कोरोना का आना कठिन है।

किसी भी संक्रामक रोग की तरह, कोरोना में भी संक्रमण अधिकांश तभी होता है जब लक्षण होते हैं। वह व्यक्ति जिसकी नाक बह रही हो, नियमित रूमाल लगा कर पोछ रहा हो, कभी हाथ से भी; और फिर वह हाथ कहीं लगा रहा हो; मेज पर, दीवाल पर, दरवाजे पर। ऐसी स्थिति में संक्रमण होने की संभावना तो है ही। कोरोना न सही, कोई और वायरस सही।

लेकिन, लक्षण भी अचानक नहीं आ जाते। वायरस आपके शरीर में उससे पहले भी पल रहा होता है। यह देखने को मिला है कि लक्षण आने से दो-तीन दिन पूर्व संक्रमण की संभावना रहती है। माध्यम फिर भी वही है। मुँह, नाक, आँख के माध्यम से निकलते पानी के रास्ते। इसके लिए छींकना जरूरी नहीं। लेकिन, किसी के शरीर में कोरोना वायरस हो, और वह इसे किसी तक पहुँचने ही न दे, तो बात आगे नहीं बढ़ेगी।

हम चिकित्सक मास्क इसलिए भी पहनते हैं कि हमसे आपको संक्रमण न हो। हमारे मुँह-नाक ढके हुए रहे। और दूसरे भी इसलिए अपना मुँह-नाक ढँकते हैं। यह कोरोना पॉजिटिव और हर व्यक्ति की ज़िम्मेदारी है कि अपनी बीमारी दूसरे तक पहुँचने न दे। और इसलिए ही हम अपने आस-पास की मेज साफ कर रहे होते हैं। अपने शरीर से निकले वायरस को वहाँ से मिटाने के लिए। दूसरे के शरीर से नहीं।

(क्रमश:)

(अगर डॉक्टर से कुछ जानने की जिज्ञासा हो या कोई सवाल तो मेल करें-[email protected] पर)

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