कोरोना वायरस और आयु का गणित

अब यह कोई छुपा रहस्य नहीं कि कोरोना एक ख़ास आयु-वर्ग को टारगेट कर रहा है। तमाम कॉन्सपिरेसी थ्योरी के पीछे भी यह कहानी है जब वे इस साँख्यिकी का हवाला देते हैं। यह इस मामले में विचित्र तो है कि अगर यह महामारी अपने चरम पर पहुँच जाती है तो संभवत: अस्सी वर्ष से ऊपर की बड़ी जनसंख्या खत्म हो चुकी होगी। ये प्रश्न भी उठ रहे हैं कि जर्मनी और स्कैंडिनैविया में मरीजों की संख्या के मुकाबले मृत्यु-दर क्यों कम है? इसका भी जवाब यहीं छुपा है।

अगर आँकड़े देखें जाएँ तो इन देशों के कोरोना मरीजों में लगभग तीन-चौथाई सत्तर वर्ष से कम उम्र के लोग हैं। और उन पर कोरोना का प्रभाव कुछ ख़ास नहीं पड़ रहा। वहीं इटली के मरीजों में लगभग सत्तर प्रतिशत लोगों की उम्र पचास से ऊपर है, तो सैकड़ों मर रहे हैं।

इस गणित के पीछे एक और वजह है कि जर्मनी और स्कैंडिनैविया बड़े पैमाने पर जाँच कर रही है। जर्मनी में तो ‘ड्राइव-थ्रू’ से कोरोना की जाँच हो रही है। ऐसा दक्षिण कोरिया में जरूर हुआ कि हल्के शक पर भी पकड़ कर जाँच करने लगे, लेकिन अन्य देश इस तरह की रणनीति नहीं अपना रहे। भारत के बजट पर तो यह मुमकिन ही नहीं, हमें भी यह समझना चाहिए। नॉर्वे में लगभग 45000 लोगों को जाँचने के बाद 2000 पॉजिटिव मिले। और मृत्यु हुए मात्र सात। यह ‘ओवर-टेस्टिंग’ है, जो एक अमीर देश ही एफॉर्ड कर सकता है; भले WHO कहती रहे।

लेकिन, एक बात जो स्पष्ट दिखने लगी है, वह ये कि सत्तर वर्ष से ऊपर के लोग अब पूरी तरह से सचेत हो गए हैं। और चूंकि इन देशों में वृद्ध अलग ही रहते हैं तो उनका अपने परिवार से संपर्क यूँ भी कम है। वहीं, ईरान में यह देखा गया कि स्वस्थ बेटे-बेटियों ने अपने अंदर पल रहे वायरस घर के बुजुर्गों को संक्रमित किए, और वे चल बसे। भारत में भी जो दूसरी मृत्यु हुई, वह यूरोप से लौटे बेटे ने अपनी बूढ़ी माँ को दिया था। हमारे समाज में बुज़ुर्ग अपने संतानों से अधिक संपर्क में हैं, कई निर्भर भी हैं, इसलिए उन तक बीमारी पहुँचनी सहज है। भले वे पूरे दिन घर में ही रहें, उनके संतान बाहर से वायरस ले आएँगे। युवा वायरस पाल कर भी स्वस्थ रहेंगे, लेकिन उनके घर के बुजुर्ग गंभीर हो जाएँगे।

इस पूरी भूमिका का ध्येय यह है कि हम जब ऑफिस से या बाहर से घर लौटें, तो निश्चिंत रह सकते हैं कि कोई गंभीर बीमारी नहीं होगी। लेकिन, आप यह ध्यान रखें कि घर में बुजुर्ग भी हैं, और उनके लिए यह जानलेवा हो सकता है। उनसे संपर्क से पहले, अपने कपड़े बदल कर, हाथ धोकर, वायरस-मुक्त हो जाएँ। तभी मिलें। यह बात कोरोना से इतर भी लागू होती है।

उस संतान की मनोस्थिति सोचिए, जिसे मामूली छींक आयी, वह ठीक भी हो गया; लेकिन उसे मालूम पड़ा कि उसी की वजह से उसकी माँ की मृत्यु हो गयी। यह भला कौन चाहेगा?

(प्रवीण झा नार्वे के एक अस्पताल में डॉक्टर है. वे चिकिस्ता से लेकर साहित्य विषयों के अग्रणी और लोकप्रिय लेखक हैं.)

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